सुशासन : एक विमर्श
सुशासन एक लुभावना शब्द है जो शासन और प्रशासन की प्रासंगिकता को बनाता और बढ़ाता है। शब्द से स्पष्ट है कि सुशासन का अर्थ होता है अच्छी विधि से किया जाने वाला शासन .. तो यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या शासन सुशासन नहीं होता ? स्वाभाविक रूप से वर्तमान परिदृश्य में यह सोचना असंभव है कि कभी शासन नियामकीय और दमनकारी हुआ करता था जहां जनता का कार्य टैक्स देना और अपनी सुरक्षा के लिए शासन की गुलामी करना बस था।
चौदहवीं शताब्दी में फ्रांस में इस बात को महसूस किया गया कि संपत्ति के अधिकार और अन्य अधिकारों के लिए उचित न्याय व्यवस्था होना आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर, रोम में सामान्य नियमों से शासन-प्रशासन चलाया जा रहा था परंतु बाद में यह महसूस किया गया कि रोम में शामिल होने जा रहे हैं राज्यों के नागरिकों के साथ क्या व्यवहार किया जाए क्योंकि अब न्याय का प्रश्न अपने नागरिक और गैर नागरिक के मध्य उठ रहा था। अतः रोम के विद्वान दार्शनिकों ने राजा को यह परामर्श दिया कि न्याय की व्यवस्था ऐसी बनाई जाए जिससे सबको न्याय मिले। इस दौरान ब्रिटेन और भारत में भी सुशासन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी और प्रशासन में इस संबंध में परिवर्तन लाने का दौर शुरू हो चुका था।
पाश्चात्य देशों में प्लेटो के दर्शन में हम सुशासन की अवधारणा देखते हैं जहां प्लेटो कहते हैं कि शासन दार्शनिकों के द्वारा बताए गए मार्ग के अनुसार चलाया जाना चाहिए जहां क्षमता संरक्षण और न्याय प्रशासन के प्रमुख तत्व होने चाहिए। जहां तक हम बात करें भारतीय शासन पद्धति की और इसमें दार्शनिक और धार्मिक स्वाद की तो हम देखते हैं कि हमारे यहां राजा कभी भी निरंकुश नहीं रहे। हड़प्पा कालीन नगरीय सभ्यता या सिंधु घाटी सभ्यता जहां आपसी सहमति से शासन चलाती थी वैदिक युग में राजा को प्रजा का पालक माना गया और स्पष्ट नियमों के आधार पर न्याय और प्रशासन की व्यवस्था की गई। उत्तर वैदिक काल में राजत्व के दैवीय सिद्धांत को बढ़ावा मिला जिससे राज्यों की शक्ति बड़ी और महाजनपद काल में राजा की शक्तियों में अतुलनीय वृद्धि देखने को मिलती है परंतु उस समय भी ऐतरेय ब्राह्मण उपनिषद और विद्वानों के ग्रंथों में हमें राजा को प्रजा का पालक बताया जाना के गुण मिलते हैं जिसका सबसे अच्छा उदाहरण है कौटिल्य की अर्थशास्त्र।
यूएनडीपी 1994 में सुशासन के आवश्यक तत्व माने गए हैं सहभागिता, पारदर्शिता, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता, वंचित वर्ग और महिलाओं कुपोषण से मुक्ति, और उन्हें समाज के हर क्षेत्र में समान प्रतिस्पर्धा के लायक बनाना तथा विश्व प्रतिस्पर्धा की भावना का उत्तरोत्तर प्रसार करना साथ ही पर्यावरण में मानकों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन के सभी अंगों से कार्य लेना तथा निजी प्रशासन को इसलिए प्रेरित करना सुशासन का मुख्य बिंदु माना गया है।
भारत में गोरवाला रिपोर्ट, एपिलबी रिपोर्ट, प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट आदि के आधार पर लगातार प्रशासन को सुशासन में बदलने का प्रयास किया जा रहा है। भारत में अभिव्यक्ति की आजादी और लिंग समानता के लिए समान मताधिकार का प्रयोग भारत की स्वतंत्रता के साथ विदेशी किया जा रहा है। भारत में सिटीजन चार्टर और सूचना के अधिकार को लागू किया गया है जिससे प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की वृद्धि होती है। इस दिशा में उठाया गया सबसे प्रमुख कदम है 73वें और 74वें संविधान संशोधन के द्वारा पंचायती राज और नगरीय निकाय की स्थापना करना। स्थानीय स्वशासन भारत की प्रशासन व्यवस्था का आधारभूत ढांचा है जो चोल साम्राज्य के समय से प्रभावी है। गांधीवादी नीतियों का समावेश करते हुए नीति निर्देशक तत्वों में इस संबंध में आवश्यक पर कानून बनाए जाने हेतु सावधान करने की मंशा संविधान सभा के द्वारा व्यक्त की गई थी जिस पर अमली जामा पहनाया जाता है।
इस वर्ष मानव विकास सूचकांक में 188 देशों के बीच हुए सर्वे में भारत 0.6 24 अंकों के साथ एक पायदान पीछे हट कर 130 से 131 वें पायदान पर चला गया है। यह सूचकांक स्वस्थ लंबे जीवन, ज्ञान तक पहुंच और जीवन जीने के एक सभ्य स्तर पर आधारित होता है। हालांकि सार्क देशों में श्रीलंका और मालदीव के बाद भारत तीसरे स्थान पर है।
वर्तमान परिदृश्य में टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव से संपूर्ण विश्व एक गांव में बदल गया है अतः प्रशासन से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। जन सहभागिता, जीएसटी, सूचना का अधिकार, सबके लिए समान न्याय और अवसर की उपलब्धता, निजी क्षेत्रों का सरकारी क्षेत्रों में बढ़ता आकार प्रशासन की नई चुनौतियां हैं। प्रशासन को जहां एक और अत्यंत पिछड़े क्षेत्रों और वर्गों का उत्थान करना होता है वहीं इन पर सब्सिडी कम करने का दबाव होता है। प्रशासन में एक और जहां भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है नई टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रयोग और सूचना के अधिकार के हथियार ने भ्रष्टाचार की जड़ों पर चोट मारनी शुरू कर दी है। जनता अब संसद पर निर्भर ना होकर सामाजिक अंकेक्षण चाहती है। ऐसे में प्रशासन को सुशासन में बदलने के लिए सहभागिता, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार को समाप्त करने की तत्परता होना अनिवार्य है।
छत्तीसगढ़ में इस संदर्भ में कुपोषण मिटाने के लिए चलाई जा रही है सरकारी योजनाओं की पूरे विश्व में सराहना की गई है और देश के अन्य राज्यों में भी बेहद कम दाम पर अनाज उपलब्ध कराने की योजना प्रारंभ की जा रही है। मनरेगा के तहत रोजगार के अवसर बढ़ाए गए हैं जिससे युवाओं को बेरोजगारी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। आंगनबाड़ी कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को अच्छा पोषक भोजन और शिक्षा दोनों ही उपलब्ध कराया जा रहा है जो कि एक सराहनीय कार्य है। तथापि छत्तीसगढ़ में श्रमिकों का पलायन और नक्सलवाद की समस्या है जिस से पार पाना राज्य शासन के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा के क्षेत्र में अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में नई पीढ़ी अपने क्षेत्र में महानगरों जैसी व्यवस्था बना सके। असल मायने में देश में सुशासन तभी सफल हो सकता है जबकि प्रत्येक नागरिक , बच्चा प्रशासन के साथ खड़ा हो और अपने देश के लिए काम करें।
सुशासन एक लुभावना शब्द है जो शासन और प्रशासन की प्रासंगिकता को बनाता और बढ़ाता है। शब्द से स्पष्ट है कि सुशासन का अर्थ होता है अच्छी विधि से किया जाने वाला शासन .. तो यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या शासन सुशासन नहीं होता ? स्वाभाविक रूप से वर्तमान परिदृश्य में यह सोचना असंभव है कि कभी शासन नियामकीय और दमनकारी हुआ करता था जहां जनता का कार्य टैक्स देना और अपनी सुरक्षा के लिए शासन की गुलामी करना बस था।
चौदहवीं शताब्दी में फ्रांस में इस बात को महसूस किया गया कि संपत्ति के अधिकार और अन्य अधिकारों के लिए उचित न्याय व्यवस्था होना आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर, रोम में सामान्य नियमों से शासन-प्रशासन चलाया जा रहा था परंतु बाद में यह महसूस किया गया कि रोम में शामिल होने जा रहे हैं राज्यों के नागरिकों के साथ क्या व्यवहार किया जाए क्योंकि अब न्याय का प्रश्न अपने नागरिक और गैर नागरिक के मध्य उठ रहा था। अतः रोम के विद्वान दार्शनिकों ने राजा को यह परामर्श दिया कि न्याय की व्यवस्था ऐसी बनाई जाए जिससे सबको न्याय मिले। इस दौरान ब्रिटेन और भारत में भी सुशासन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी और प्रशासन में इस संबंध में परिवर्तन लाने का दौर शुरू हो चुका था।
पाश्चात्य देशों में प्लेटो के दर्शन में हम सुशासन की अवधारणा देखते हैं जहां प्लेटो कहते हैं कि शासन दार्शनिकों के द्वारा बताए गए मार्ग के अनुसार चलाया जाना चाहिए जहां क्षमता संरक्षण और न्याय प्रशासन के प्रमुख तत्व होने चाहिए। जहां तक हम बात करें भारतीय शासन पद्धति की और इसमें दार्शनिक और धार्मिक स्वाद की तो हम देखते हैं कि हमारे यहां राजा कभी भी निरंकुश नहीं रहे। हड़प्पा कालीन नगरीय सभ्यता या सिंधु घाटी सभ्यता जहां आपसी सहमति से शासन चलाती थी वैदिक युग में राजा को प्रजा का पालक माना गया और स्पष्ट नियमों के आधार पर न्याय और प्रशासन की व्यवस्था की गई। उत्तर वैदिक काल में राजत्व के दैवीय सिद्धांत को बढ़ावा मिला जिससे राज्यों की शक्ति बड़ी और महाजनपद काल में राजा की शक्तियों में अतुलनीय वृद्धि देखने को मिलती है परंतु उस समय भी ऐतरेय ब्राह्मण उपनिषद और विद्वानों के ग्रंथों में हमें राजा को प्रजा का पालक बताया जाना के गुण मिलते हैं जिसका सबसे अच्छा उदाहरण है कौटिल्य की अर्थशास्त्र।
यूएनडीपी 1994 में सुशासन के आवश्यक तत्व माने गए हैं सहभागिता, पारदर्शिता, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता, वंचित वर्ग और महिलाओं कुपोषण से मुक्ति, और उन्हें समाज के हर क्षेत्र में समान प्रतिस्पर्धा के लायक बनाना तथा विश्व प्रतिस्पर्धा की भावना का उत्तरोत्तर प्रसार करना साथ ही पर्यावरण में मानकों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन के सभी अंगों से कार्य लेना तथा निजी प्रशासन को इसलिए प्रेरित करना सुशासन का मुख्य बिंदु माना गया है।
भारत में गोरवाला रिपोर्ट, एपिलबी रिपोर्ट, प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट आदि के आधार पर लगातार प्रशासन को सुशासन में बदलने का प्रयास किया जा रहा है। भारत में अभिव्यक्ति की आजादी और लिंग समानता के लिए समान मताधिकार का प्रयोग भारत की स्वतंत्रता के साथ विदेशी किया जा रहा है। भारत में सिटीजन चार्टर और सूचना के अधिकार को लागू किया गया है जिससे प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की वृद्धि होती है। इस दिशा में उठाया गया सबसे प्रमुख कदम है 73वें और 74वें संविधान संशोधन के द्वारा पंचायती राज और नगरीय निकाय की स्थापना करना। स्थानीय स्वशासन भारत की प्रशासन व्यवस्था का आधारभूत ढांचा है जो चोल साम्राज्य के समय से प्रभावी है। गांधीवादी नीतियों का समावेश करते हुए नीति निर्देशक तत्वों में इस संबंध में आवश्यक पर कानून बनाए जाने हेतु सावधान करने की मंशा संविधान सभा के द्वारा व्यक्त की गई थी जिस पर अमली जामा पहनाया जाता है।
इस वर्ष मानव विकास सूचकांक में 188 देशों के बीच हुए सर्वे में भारत 0.6 24 अंकों के साथ एक पायदान पीछे हट कर 130 से 131 वें पायदान पर चला गया है। यह सूचकांक स्वस्थ लंबे जीवन, ज्ञान तक पहुंच और जीवन जीने के एक सभ्य स्तर पर आधारित होता है। हालांकि सार्क देशों में श्रीलंका और मालदीव के बाद भारत तीसरे स्थान पर है।
वर्तमान परिदृश्य में टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव से संपूर्ण विश्व एक गांव में बदल गया है अतः प्रशासन से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। जन सहभागिता, जीएसटी, सूचना का अधिकार, सबके लिए समान न्याय और अवसर की उपलब्धता, निजी क्षेत्रों का सरकारी क्षेत्रों में बढ़ता आकार प्रशासन की नई चुनौतियां हैं। प्रशासन को जहां एक और अत्यंत पिछड़े क्षेत्रों और वर्गों का उत्थान करना होता है वहीं इन पर सब्सिडी कम करने का दबाव होता है। प्रशासन में एक और जहां भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है नई टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रयोग और सूचना के अधिकार के हथियार ने भ्रष्टाचार की जड़ों पर चोट मारनी शुरू कर दी है। जनता अब संसद पर निर्भर ना होकर सामाजिक अंकेक्षण चाहती है। ऐसे में प्रशासन को सुशासन में बदलने के लिए सहभागिता, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार को समाप्त करने की तत्परता होना अनिवार्य है।
छत्तीसगढ़ में इस संदर्भ में कुपोषण मिटाने के लिए चलाई जा रही है सरकारी योजनाओं की पूरे विश्व में सराहना की गई है और देश के अन्य राज्यों में भी बेहद कम दाम पर अनाज उपलब्ध कराने की योजना प्रारंभ की जा रही है। मनरेगा के तहत रोजगार के अवसर बढ़ाए गए हैं जिससे युवाओं को बेरोजगारी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। आंगनबाड़ी कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को अच्छा पोषक भोजन और शिक्षा दोनों ही उपलब्ध कराया जा रहा है जो कि एक सराहनीय कार्य है। तथापि छत्तीसगढ़ में श्रमिकों का पलायन और नक्सलवाद की समस्या है जिस से पार पाना राज्य शासन के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा के क्षेत्र में अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में नई पीढ़ी अपने क्षेत्र में महानगरों जैसी व्यवस्था बना सके। असल मायने में देश में सुशासन तभी सफल हो सकता है जबकि प्रत्येक नागरिक , बच्चा प्रशासन के साथ खड़ा हो और अपने देश के लिए काम करें।

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